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प्रतापगढ़: किसी भी नेता की छवि उसके पूरे क्षेत्र और प्रतिनिधित्व को दर्शाती है। जब नेता खुद ही करचोरी और कालाबाजारी के आरोपों से घिरा हो तो उसके क्षेत्र और वहाँ रहने वालों के विषय में भी गलत सन्देश जाता है। बात कर रहे हैं प्रतापगढ़ नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष हरिप्रताप सिंह की। नगर पालिका अध्यक्ष नगर का प्रथम नागरिक होता है, जब वो खुद ही अपने क्षेत्र की जनता के लिए बनाए नियमों की धज्जियाँ उड़ाए तो आम जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है।
पट्टी तहसील के सर्वजीतपुर से आकर पूरा परिवार शहरी जीवन की लालसा में शहर के अजीत नगर वार्ड में किराए के मकान में रहना शुरू करता है, उसी परिवार का एक युवक करीब 20 वर्ष पहले जीप चला कर आजीविका कमाते हुए धीरे धीरे राजनीति में आता है और राजनीतिक चापलूसी के सहारे अनाज की कालाबाजारी से जड़ें जमाना शुरू करता है, फिर राजनीतिक सम्बन्धों के सहारे चुनाव में उतरकर राजनीतिक उतार चढ़ाव और कमाई के अलग अलग तरीकों के सहारे आज वो शख्स अरबपति बनकर हरिप्रताप सिंह के नाम से जाना जाता है। भाजपा के टिकट से जीते हरिप्रताप सिंह तब चर्चा में आये जब अगले चुनाव में पार्टी से टिकट न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़े और सभी को मात देते हुए जीत हासिल किए। हालांकि इस जीत का कारण स्थानीय लोग जुगाड़बाजी और धन देकर वोट खरीदने को मानते हैं। जीत के बाद फिर से भाजपा में शामिल हुए और वर्तमान में हरिप्रताप सिंह की पत्नी प्रेमलता सिंह भाजपा के टिकट पर नगर अध्यक्षा के पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। हरिप्रताप सिंह के ऊपर पार्टी के लोग पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप लगाते रहते हैं। हरिप्रताप सिंह कभी दो-चार महीने के लिए सार्वजनिक रूप से तो कभी अफवाहों में भी काँग्रेस और अन्य पार्टियों की सदस्यता के लिए मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं।
फिलहाल हम आपको बताने जा रहे हैं पूर्व नगर अध्यक्ष द्वारा की गई कर चोरी के बारे में। 25 वार्डों वाली नगरपालिका में भवनकर और जलकर वसूली के लिए हरिप्रताप सिंह की अध्यक्षता में एक उपविधि का निर्माण किया गया, जिसके अनुसार बैनामे के लिए जिलाधिकारी की सर्किल रेट के अनुसार खरीदे गए स्टाम्प का 5% भवनकर और 12% जलकर निर्धारित किया गया। पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष का पूरा परिवार शहर में शुरुआत एक किराए के कमरे में करता है, तो जाहिर है शहर में जो भी सम्पत्ति बनाई गई है वो बैनामा करवाकर ही बनाई गई होगी। शुरुआत उसी मकान से करते हैं जिसमें इनके परिवार ने किराए पे रहना शुरू किया था। समय के साथ जब कमाई बढ़ी तो हरिप्रताप सिंह ने वो मकान अपने पिता स्व. जगदीश बहादुर सिंह पुत्र स्व. राज बहादुर सिंह के नाम से बैनामा करवा लिया। पर हैरानी इस बात की है कि उस रिहायशी भवन का भवनकर मात्र 63 रुपये और जलकर मात्र 150 रुपये लगा है। बाकी नियम से इसका कर 5000 के आसपास होना चाहिए, लेकिन वो कहावत है न कि "सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का" और यहाँ तो पूरी कोतवाली क्या नगर पालिका ही अपनी है, तो यहाँ सवाल उठाने की हिम्मत कौन करे।
इतना ही नहीं, अगर हरिप्रताप सिंह की संपत्तियों पर नजर डालें तो सई पुल के बाद चिलबिला के तरफ अवैध तरीके से शहर का कूड़ा डालकर वनविभाग/पीडब्ल्यूडी की जमीन पर कब्जे के मामले में कोई सवाल उठाने वाला ही नहीं है। जहाँ हर पंचवर्षीय में लगभग बीघे भर का प्लॉट कूड़े की डम्पिंग से ही तैयार कर लिया जाता है।
इतना सब होने के बाद भी न तो प्रशासन और न ही भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना दिखाने वाली भाजपा के नेताओं को हरिप्रताप सिंह की ये सब कारस्तानियां दिखती हैं या फिर देखकर भी अनदेखी की जाती हैं। देखने वाली बात है कि अब प्रतापगढ़ की जनता इन सबका क्या जवाब 22 तारीख को बैलेट बॉक्स में डालती है।
