देश की आजादी में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का योगदान अमूल्य रहा है। इसे कोई भी कभी भुला नहीं सकता। बेल्हा में 1857 के संग्राम से लेकर 1947 में आजादी तक अंग्रेजों की यातना के खिलाफ प्रतापगढ़ी वीर सपूतों के हौसले का गवाह है। प्रतापगढ़ जवाहर लाल नेहरू, पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, राजाराम किसान, बाबा राम चन्द्र, शहीद कुंवर लाल प्रताप सिंह, बाबु गुलाब सिंह, बाबु मेंदिनी सिंह, जैसे अनेक महान स्वतंत्रा संग्राम सेनानियों और क्रांतिकारियों ने आजादी की अलख जलाई थी। बेल्हा के महामना कहे जाने वाले एक मात्र पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय ही हैं जिनका हस्ताक्षर देश के संविधान में है।
१८५७ की क्रांति में कालाकांकर के वीर शहीद कुंवर लाल प्रताप सिंह
१८५७ की क्रांति में कालाकांकर के वीर शहीद कुंवर लाल प्रताप सिंह
१८५७की क्रांति के दौरान जब इलाहाबाद व उसके निकटवर्ती के क्षेत्रों में भारी दमनराज चलाने के बाद घमंड से भरा जनरल नील जब सुल्तानपुर के रास्ते लखनऊ की तरफ जा रहा था, तब अवध की बेगम हजरत महल ने प्रतापगढ़ के कालाकांकर नरेश और अमेठी नरेश राजा लाल माधव को उसकी सेना को रोकने का संदेश भेजा। तब नील लखनऊ रेजीडेंसी को मुक्त कराने के उद्देश्य से बहुत बड़ी सैन्य शक्ति के साथ जा रहा था।
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| शहीद लाल प्रताप सिंह |
मौजूद दस्तावेजों के अनुसार १८ फ़रवरी १८५८ को चाँदा की लड़ाई में बीस हजार से ज्यादा स्वातंत्र्य वीरों ने भाग लिया था। जिसमे पैदल सिपाही पच्चीस हज़ार और सवार चौदह हज़ार के करीब थे। बाकी जंग में सम्मिलित होने पहुंचे क्षेत्रीय किसान व मजदूर थे। उनके पास उस समय तोप जैसी उन्नत हथियार होने के बजाय लाठी, बल्लम, भाला जैसे परंपरागत हथियार और कइयों के पास तलवारे थी।
परन्तु चाँदा की लड़ाई में बागी नेताओं के पास अलग-अलग श्रेणी की २३ तोपें भी थीं। इन सारी तैयारियों बाकायदा जायजा लेकर इस बार हमला ब्रिटिश ने सभी तरीको को अख्तियार करके किया। इस बार अंग्रेजों की कुटिल नीति और खुफिया तैयारियों के कारण बागियों की हार हुई। दिनांक १९ फ़रवरी १८५८ को चाँदा की लड़ाई में बेल्हा के महान सपूत युवराज लाल प्रताप सिंह की हुई शहादत क्रांतिकारियों की सबसे भारी क्षति साबित हुई। यही नहीं चाँदा की ऐतिहासिक लड़ाई में युवराज लाल प्रताप सिंह के चाचा अमेठी नरेश राजा माधव सिंह भी लड़ते -लडते मातृ-भूमि पर शहीद हो गए। उन्होने केवल २६ वर्ष की कम आयु में ऐतिहासिक चाँदा की लड़ाई में अपने प्राणों का बलिदान हंसते-हंसते दे दिया था। इस महान नायक की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए उनके शहादत तिथि १९ फ़रवरी २००९ को भारत के डाक विभाग ने एक विशेष स्मारक डाक टिकट एवं प्रथम दिवस आवरण जारी किया।
१८५७ के दो क्रांतिकारी भाई गुलाब और मेंदिनी
तरौल (तारागढ़) के जमींदार बाबू गुलाब सिंह और मेंदिनी सिंह ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। ब्रिटिश
तरौल (तारागढ़) के जमींदार बाबू गुलाब सिंह और मेंदिनी सिंह ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। ब्रिटिश
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बेल्हा में रखी गई किसान आन्दोलन की नींव
सन १९१८ का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन की नींव यही प्रतापगढ़ में रखी गई. होमरूल लीग के वर्कर्स के
सन १९१८ का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन की नींव यही प्रतापगढ़ में रखी गई. होमरूल लीग के वर्कर्स के
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| पं० मुनीश्वर दत्त उपाध्याय |
ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचन्द्र उभर कर सामने आए। उत्तर प्रदेश के इस प्रसिद्ध किसान आन्दोलन को सन १९२० के दशक में सबसे ज्यादा मजबूती स्वतंत्रता सेनानी बाबा रामचन्द्र ने प्रदान की। उनके निजी प्रयासों से ही दिनांक १७ अक्टूबर, १९२० ई. को जनपद प्रतापगढ़ में अवध किसान सभा का स्थापना किया गया। जनपद का खरगाँव किसान सभा की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र था। इस संगठन को पंडित जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र, केदारनाथ, माता बदल पांडे आदि सपूतों ने अपने सहयोग से आन्दोलन को शक्ति प्रदान की।
महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन की अलख बेल्हा में जगाई थी
अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश को आजाद कराने वाले महात्मा गाँधी का नाम आते ही प्रतापगढ़ वासियों में उनकी स्मृति ताजा हो जाती है। वैसे तो बापू दो बार यहाँ आए और लोगों में देश को आजाद कराने का जज्बा जगाया। प्रतापगढ़ में पहले से ही किसान आंदोलन चल रहा था। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान साल १९१७ में पट्टी में बाबा रामचंद्र के मार्गदर्शन में चलाया जा रहा था। बापू को लगा कि कृषको के सहयोग से अंग्रेजी हुकूमत को देश से शीघ्र भगाया जा सकता है। दिनांक २९ नवंबर, साल १९२० प्रतापगढ़ शहर आना हुआ, उनके साथ पंडित मोती लाल नेहरू मौलाना अबुल कलाम आजाद सौकत अली खान भी संग थे। यहाँ उन्होंने अपने मित्र इंद्र नारायण चड्ढा के घर पर कुछ वक्त ठहरने के बाद स्टेशन क्लब स्थित मैदान में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उस वक्त जिलाधिकारी बी०एन० मेहता थे। उनसे मिलने महात्मा गाँधी पैदल ही उनके घर तक गए।
बापू ने जिले में जलाई थी विदेशी कपड़ों की होली
यदि बात आज़ादी के आंदोलन की हो और प्रतापगढ़ के कालाकांकर का उल्लेख न हो तो बात मुकम्मल नही होगी। कालाकांकर राजभवन का स्वतंत्रता की लड़ाई में गौरवशाली इतिहास रहा है। दिनांक १४ नवंबर सन १९२९ को महात्मा गाँधी जब दूसरी बार बेल्हा आये तो उन्होंने कालाकांकर नरेश राजा अवधेश सिंह के संग गांधी चबूतरे पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। वहां गांधी चबूतरा आज भी जीवंत है।
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| कालाकांकरमें राजा अवधेश सिंह के साथ महात्मा गाँधी |
बेल्हा के इस सपूत ने झेली कठोर यातनाये
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| राजाराम किसान |





