रक्षाबंधन के पवित्र पर्व पर अमूमन भाई अपनी बहन को उपहार देता हैं।। मगर यहाँ इसके उलट एक बहन ने अपने भाई को अमूल्य उपहार देकर अनोखी उदाहरण पेश की है। बीमारी से ग्रसित भाई की जिंदगी की रक्षा के लिए उसने अपनी गुर्दा ही उसे डोनेट कर दी। आज भाई पुरतःस्वस्थ है और इस बार बहन खुशी-खुशी भाई की कलाई पर प्रेम का धागा बांधेगी।
नगर कोतवाली अंतर्गत आने वाले बहलोलपुर के रहिवासी 50 वर्षीय राकेश श्रीवास्तव की फैमिली गऊघाट रोड के जानकीपुरम मोहल्ले में निवास करता है। भदरी हाउस, प्रतापगढ़ सिटी के नजदीक ही लैब का व्यवसाय करते हैं। उनके दो पुत्र हैं। बड़े बेटे क्षितिज एक चिकित्सक है तो छोटा अमित अभियंता। उनकी बेटी ज्योति टीचर है। राकेश शुगर व उच्च रक्तचाप की बीमारी से ग्रसित थे। 1 जनवरी 2015 को एकाएक उनकी तबियत खराब हुई तो जांच में गुर्दा खराब होने की बात सामने आई और फिर डॉक्टरों के मशवरा के अनुसार राकेश की डायलिसिस चालू की गई। इस सिलसिले में वरिवर वालों को हफ्ते में 2 बार इलाहाबाद जाना पड़ता था। 2 माह पूर्व जून महीने में अचनक राकेश की तबियत खराब हुई तो डॉक्टरों ने अवस्था सीरियस बताते हुए गुर्दा बदलने की परामर्श दी। राकेश की स्थिति दिन-ब-दिन और भी बद्तर होने लगी। इस दौरान पत्नी आशा किडनी दान के लिए रेडी हुई, लेकिन जांच में चिकित्सकों ने आशा की किडनी को ट्रांसप्लांट के लिए अयोग्य बताया। परिवार वालों के मुताबित चिकित्सकों ने भाई अथवा फिर बहन की गुर्दा की ट्रांसप्लांटेशन प्रोसेस अच्छी तरह होने की पुष्टि की। इसकी बात की जानकारी जैसे ही छोटी बहन पूनम को हुई तो वह जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष कर रहे भाई राकेश की जान बचाने के लिए खुद की किडनी देने को राजी हो गई। विश्वनाथगंज स्थित पूनम के ससुराल वालों से पूनम के मायकेवालों ने वार्तालाप की और वेलोग भी तैयार हो गए। ताबड़तोड़ नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में ले गए जहाँ पूनम का गुर्दा राकेश को ट्रांसप्लांट कर दिया गया। शल्यक्रिया सफल होने के बाद परिवार वालों की आशाएं जिंदा हो गईं। राखी पर मायके आई पूनम ने कहा कि जिस भाई के प्रेम और दुलार के बीच पली बढ़ी, वो अपने भाई को ऐसे कैसे मरने के लिए छोड़ देती। माँ-बाप की भांति जिसने लाइफ के हर मोड़ पर साथ रहा हो, उस भाई की जान बचाने के लिए इससे अच्छा अवसर और कुछ नहीं हो सकता था। इस तरफ बेल्हा की पूनम ने भाई-बहन प्रेम की ऐसी मिसाल कायम की, लोग हमेशा याद रखेगे।
