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| पुल बनाते ग्रामीण |
प्रतापगढ़: करौंदी घाट दशकों से एक पुल के लिए प्रतीक्षारत है। शासन, प्रशासन हजारों वादे और दावे करता है, देश के आखरी व्यक्ति तक हर सुविधा पहुँचाने का। पर प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ये घाट आजादी के पहले से ही अपने लिए एक अदद पुल का इंतजार कर रहा है। घाट से जुड़े दर्जनों गाँव के लोग आवागमन के लिए एकमात्र नाव के सहारे हैं। जिसपर हमेशा किसी दुर्घटना का खतरा मंडराता रहता है।
विकास खण्ड सदर के अंतर्गत आने वाले इस करौंदी घाट से एक परिवार का रिश्ता सदा से बना रहा है। उस परिवार के ही चंद्रदेव सिंह अब अकेले बचे हैं जो यहाँ नाव चलाते हैं। जिनके पूर्वज भी यही काम करते थे। चंद्रदेव सिंह बताते हैं कि "घाट पर पुल न बनने से आसपास के लगभग पच्चीस गाँव प्रभावित हैं।" चंद्रदेव से जब उनकी कमाई की बात पूछी गयी तो वो बोले कि "किससे मोलभाव करें, सब अपने जानने वाले ही तो हैं सबकी मजबूरी है जान जोख़िम में डालकर नदी पार करना। जो दे देता है तो ले लेते हैं, नही देता तो समाजसेवा समझकर राम राम कर लेते हैं।"
नाविक चंद्रदेव बताते हैं कि "बहुत बार ऐसा हुआ है कि नदी में पानी ज्यादा होने की वजह से नाव किनारे तक नही पहुंच पाई, बीच मे ही डूब गई। लेकिन कोई अप्रिय घटना नही हुई, इसके लिए घाट के किनारे बने महादेव के मंदिर की कृपा है।" चंद्रदेव का कहना है कि भगवान की कृपा से अब तक सब कुशल ही रहा है।
घाट पर ग्राम वासी बाँस बल्लियों के सहारे पुल का निर्माण करते हैं लेकिन वो कितना चलेगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। गाँव के लोग जिन्हें न कोई तकनीक पता है, न मजबूत लकड़ी और रस्सी मिल पाती है। गाँव के लोग अपनी सुविधा के लिए लकड़ी और बाँस से पुल बनाते हैं लेकिन वो बाढ़ में बह जाता है।
गाँवों के लोग सरकार और स्थानीय नेताओं से किस कदर ख़फ़ा हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गाँव मे अबकी चुनाव का बहिष्कार करने का इरादा भी बन रहा है। एक तरफ देश बुलट ट्रेन और हाईस्पीड वाले एक्सप्रेसवे के स्वागत को तैयार है और यहाँ एक छोटी सी नदी पर पुल बनाने में भी जिला प्रशासन और नेताओं की हवा निकल जा रही है, कोई इसकी सुध नही ले रहा।
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| नाव से नदी पार करती छात्राएं |
फिलहाल संगम लाल गुप्ता का कहना है कि उन्होंने इसके लिए सरकार को अपना प्रस्ताव दिया है, जल्द ही उचित समाधान निकलने की आशा है।

