स्त्री-संत भी सदैव पूज्य, राजनीति से सनातन संतों को रहना चाहिए विरक्त - पं० ज्ञान प्रकाश शुक्ल - Pratapgarh Samachar

Breaking

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

स्त्री-संत भी सदैव पूज्य, राजनीति से सनातन संतों को रहना चाहिए विरक्त - पं० ज्ञान प्रकाश शुक्ल


वरिष्ठ अधिवक्ता एवं विचारक पं० ज्ञान प्रकाश शुक्ल ने राजनीति में संतो की भूमिका और स्त्री-संतों के महत्व पर छिड़ी बहस पर अपना सशक्त अभिमत रखते हुए कहा कि- भारतीय सनातन संस्कृति में स्त्री-संतों की अनादिकाल से पूज्यपाद सुसंस्कृति परक प्रभावी स्थिति अद्यावधि तक बनी हुई है, ब्रह्मांड की सुरुचिपूर्ण परिकल्पना भी सनातन स्त्री से परे है। जहां तक मैंने रामचरित मानस और महाभारत को पढ़ा है स्त्री संतों की धार्मिकता के उपदेश पूर्णतया स्वीकार है। गार्गेय , मैत्रेयी, सीता, सावित्री, अरुंधति तथा आधुनिक मीरा के धार्मिक उपदेशों ने समय-काल के अनुरूप भारतीय संस्कृति को सदैव पुनर्जीवन दिया है।
संत सावित्री ने अपने धार्मिक उपदेशों से ही यमराज से संवाद स्थापित कर सत्यवान को पुनर्जीवित कराया।
 गार्गेयी मैत्रेयी का पूरा संवाद ही धार्मिक उपदेशों को परिपूर्ण बनाता है इसलिए यह कहना सनातन समाज को भ्रमित करना होगा, कि स्त्री संतों का उपदेश दोषपूर्ण है, यह कदापि सत्य नहीं है महाभारत में द्रोपदी और राधारानी ने भी धर्मयुद्ध में कौरव पक्ष से उपदेशात्मक संवाद किया है, यहाँ मैं कथावाचिका देवी महेश्वरी का समर्थन नहीं कर रहा और न ही किसी अन्य विचारों का खंडन मंडन।
संतों को राजनीति से विरत रहना चाहिए, इसका मैं पूर्ण एवं प्रबल समर्थन करता हूँ। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महराज ने रामराज्य परिषद की स्थापना जरूर की, रामराज्य परिषद के बैनर से संसदीय प्रतिनिधित्व भी हुआ, किंतु ज्ञात रहे जगद्गुरु स्वामी करपात्री जी महाराज ने भी कटु अनुभव करते हुए अपने जीवनकाल में ही रामराज्य परिषद को भंग कर दिया था इसे भंग करते हुए सनातन संस्कृति के ध्वजवाहक स्वामी करपात्री महाराज ने अपना अनुभव साझा किया था कि सनातन संत को राजनीति की मृगतृष्णा के भंवरजाल में कभी नहीं पड़ना चाहिए।
आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली सनातन जनमानस को भी बहुदलीय आस्था में रखती है ऐसे में किसी भी सनातन संत का कोई भी एकदलीय अनुराग उसके निरपेक्ष ज्ञान को भी स्वतः विभक्त कर देता है, प्रपंचनाओं से भरी किंवदंतियों की सत्यकथा हमे वैदिक ज्ञान प्रदान नहीं कर सकती इसलिए उलूक ज्ञान के अंधकार में विचरण करते हुए सनातन समाज को स्त्री अथवा पुरूष प्रधानता के चश्मे से विषाक्त एवं विभक्त नहीं किया जाना चाहिए बल्कि हमें वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, मानस के तथ्य ज्ञान में डूबते हुए सच की अवधारणा को स्वीकार करते हुए आत्म श्वाघा से बचना चाहिए।
कूप-मंडूप कभी भी विद्वता के सागर की लहरों का दर्पण नही देख सकता, अध्ययन करना चाहिए जब जब अधर्म बढ़ा है देवी-संतों ने केश खोल रखे थे, यहाँ तक कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने भी माता सीता को वनगमन काल में सती अनुसुइया से धार्मिक दीक्षा ग्रहण करने का मार्गदर्शन भी किया था।